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hindi story Laddu Gopala

                             हिंदी कहानी है लड्डू गोपाला की 




हर भगवन को  लोगो ने ,हमारे परिबार के मेंबर की तरह सम्बन्ध   जोड़ी है। कोई हमारे माँ  है। कोई है  हमारे पिताजी की तरह ,उनको बुलाते भी है पिता की तरही-जैसे की भोले बाबा !दुर्गा माँ ,काली माँ कहेके !भोले बाबा को तो बंगाल में दामाद के रूप में मना  जाता है , शिव रात्रि की उपबास रखते है, शिव जी को हस्बैंड के रूप में पाने के लिए,कुमारी लड़किया । सबसे ज्यादा मानव के जीबन में आना पड़े भगवन बिष्नु को..... 

भगवन बिष्नु को कभी राम,कभी कृष्णा के रूप में जग में आना पड़े ,आपने भक्तो की आशा पुराण करने के लिए। सबसे प्रसिद्ध महाकाब्य लिखा गया इसी राम जी और कृष्णा जी के ही  कारन।  रामायण,महाभारत की मूल चरित्र है भगवन  बिष्णु।कृष्णा अवतार की बचपन की रूप है लड्डू गोपाल  । और एहि रूप बड़ा आकर्षक है माताओ के पास। आज की हिंदी कहानी उसकी ऊपर है। 



किउ लिख रहा हु


लड्डू गोपाला की हज़ारो कहानी आप लोगो ने पड़े  होंगे हिंदी स्टोरीज की रूप मे। सभी लैंग्वेज में हर कोइ कोसिस किये गोपाला के बारे में बर्णन करने के लिए। में भी आज आप सबके साथ गोपाला के महिमा की एक्सपीरियंस भाग  कर रहा हु।' काकोलिब ब्लॉग्स ' ब्लॉग में ,में कोसीस करता हु हमेशा सही और सच्चा कहानी लिखने की। साथ में जो सकात्मक सोच हो उसीको सबके सामने लाना। ये  कहानी किड्स  के िये भी अच्छा है। 

में पश्चिम  बंगाल के एक गाओं मे रहेता हु। २० साल के आस पास में नई दिल्ली, ओडिशा,मुंबई में में रहे चूका हु।  और अभी में कोलकाता में नौकरी करता हु ,रहता हु howrah  में। लिखना मेरा पैशन है। आप सबकी प्यार चाहिए इसके लिए ,अच्छा लगे ये बुरा आप अगर रिस्पांस देंगे तो मुझे अच्छा  लगेगा।और सबसे बढिये लगेगा किआप किस टॉपिक्स में पड़ना चाहते हो, ये अगर जान पाए तो।  

कहानी की सुरुवात 

दिल्ली से वापस  आये हम पूरा परिबार केसाथ और पुराण बिल्डिंग  तोड़के नए बिल्डिंग बन रहा है। मेरे भाई ,चाचा सभी मिलके सहमत होके बिल्डिंग तयेर कर रहा है। हम लोग टोटल थे 16 जन । जब बिल्डिंग बन रहा  था, तब  हमे अलग अलग रहना पड़ा। बिल्डिंग रेडी होने के बाद एक साथ फिर होंगे हम लोग। तब तक के लिए 
सबको अलग अलग रहना है ,अलग  किराय के माकन पर। 

इसी टाइम पे ,माँ को और बीवी बच्चो के लेके ,मुझे दिल्ली फिर आना पड़े ,किराय के फ्लैट को लॉक करके। प्लान किया ऑफिसियल काम खतम करके,हरिद्वार घूमने जाऊंगा। माँ इसे पहले भी हरिद्वार गए थे। झूमा भी हरिद्वार की शाम के आरती देखना चाहा रहा थी। मुझे चाहिए था थोड़ा पीस फूल जगा ,जंहा में आराम से  थोड़ी दिन बिताऊंगा। टारगेट डेस्टिनेशन, हरिद्वार फिक्स्ड हो गए।

घर में हमारे चलते नहीं है!ओपन कॉन्फेशन कर रहा हु !तो माँ और बीवी राज़ी होगये तो में थान लिया की गंगा किनारे होटल लेना है। सुभे और शाम को जाके  बैठ न है उंहा  पे,बहुत ही बढ़िया मनोहर दृश्य होगा उन्हे का। जब शाम को हरकीपौड़ी  घाट में आरती होते है,तब पता नहीं गंगा के पानी भी बहते है बहुत ही जोर जोर से। दिल्ली से जाने की रात को  सब गड़बड़ हो गए अचानक ,माँ रात को रो ता  हुआ उठ पड़ा !

उफ़ बाबा !रोने की बाज़ा क्या है? ना उनकी लड्डू गोपाल howrah  की किराये की माकन की ,मंदिर से धीर पाए निचे उतर रहा था !माँ की रोना चालू हो गए उस बजा से ,उनका कहना है की लाड्डू गोपाल की सेवा नहीं होने के बजा  से ही, वह निचे आ रहा था। अब हरिद्वार  नहीं जाना है ,सीधा howrah  वापस जाना है उनको। एक प्रकार के खाना पीना छोड़ दिए वह ,हम लोग भी उनको समझा के ,दिल्ली ऑफिस की मदद से हम howrah  वापस आये।

घर के पंछी वापस आये 

पूरा परिबार के साथ वपस आये हम लोग होरह की  फ्लैट में। मेरा माँ एक प्रकार दौड़ते हुआ ,घर में घुसा ,धूम 
धूम करके ऊपर के मंदिर बना हुआ रूम के सामने गए और फिर लड्डू गोपाल को देख के ,उनका मूड ठीक हुआ। मेरा मूड ख़राब  हो गए ,एक हफ्ता छुट्टी अभी भी बाकि ,सोच रहा हु काल ही ज्वाइन करलु। माँ बैठ गए लड्डू गोपाल के सामने ,मूर्ति की तरफ देख रहा था और उनकी आँखों में से आँशु बहे रहा था।

में वैसे तो धार्मिक हु ,दो टाइम जप भी करता हु। लेकिन उस छोटा सा मूर्ति में मुझे कुछ खाश दिखाई नहीं देते। लेकिन मेरे माँ को कुछ अलग सा जरूर दिखाई देता होगा ,तभी तो हरिद्वार छोड़के Howrah आयी भागते हुआ।
अब िधारकया हुआ,  हम लोग नहीं रहेंगे तो पुजारी जी को भी मौका मिले थे ,हमारे घर न आने की। मा बोला जल्दी जल्दी नाहा लो ,बाजार जाओ और लड्डू गोपाल के लिए मख्खन ,मिश्री ,मिठाई ले आओ। साथ में फूल की दुकान से फूल ले आना।

में बाजार गए ,नाहा धोके ,सब कुछ ले आये जो जो माँ बोली थी सब कुछ। पूजा के लिए धोती पहना मैंने। माँ पूजा की सरे जुगाड़ कर लिए थी। एक कप चाय तक नहीं मिला ,माँ ज़िद पकड़ के बैठी थी पहले गोपाल के सेवा होगी फिर घरमे हमलोग खाएंगे !पता  नहीं गोपाला कितने उपबास  में थे,लेकिन बगैर चाय पिए मेरा जान तो जा रहा था !हे गोपाला तुम भी तो चाय पि सकते हो भगवन!

दस दिन की घर बांध था ,माँ और मेरा पत्नी मिलके सब साफ किया धूल, ाचा करके धोया। गोपाला को शयन  देके हम लोग दिल्ली गए थे, अब उनको उठाना होगा।गोपाला की छोटा सा पलंग है ,वह वही पे सोये है , मच्छर दानी खोलना पड़ेगा,तकिए सरे अलग रखना होगा,  और फिर उनको उठा के, पथ्थर की बाउल पे नाहा के ,लकड़ी की बने हुआ सिंहशान पे उनको बिठा के ही पूजा करना पड़ता। माँ उनको सोने के टाइम पे छूती नहीं।

अब एहि काम ,यानि  गोपाला  को  बिस्तर  से उठाना पड़ता किसी मर्द को। आज एहि काम मुझे हि करना पड़ेगा। माँ और झूमा संख में आवाज़ दिया मुझे इशारा किये की ,मच्छर दानी उठा....... . हमारे इस फ्लैट की ,इसी घर की मंदिर है सेकंड फ्लोर में। खुला छाड है ,दो चार बड़े बड़े पेड़ है नारियल  की। ऐसे रूम को बंगाल में 'चीले कोठा' बोलते है ,दिन में  सूर्य की रौशनी आते है बहुत और हवा भी।

साढ़े  11 बजने बाला  था ,में धीरे धीरे मच्छरदानी खोल रहा था ,तभी सुनाई दिए पटांग ,पटांग आवाज़ ,जैसे की कोई अंग ढाई ले रहा है ,और एहि आवाज़ चले कम से कम 10 सेकंड तक ! हम  पथ्थर बन गए  थे तीनो। मेरा हाथ प्येर काँपने लगे। मेरे माँ और बीवी रोने लगे ,में देखा लड्डू गोपाला जैसे पहले भी हंस मुख होते  है,अभी भी वैसेही हांश रहा है ,बड़ा प्यारा है उनकी वह हंस मुख !










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